Tuesday, August 27, 2013

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी


जब-जब पृथ्वी पर सत्तामद में चूर अहंकारी अधर्मी असुरों की वृद्धि होती है, जब-जब अपने को अजर-अमर समझकर सत्तासीन क्रूरता नीति का सर्वथा त्याग कर देती है, जब-जब धर्म की हानि होती है और समूची धरती इनके अत्याचारों से त्राहि-त्राहि कर उठती है, तब-तब पृथ्वी पर सज्जनों की पीड़ा हरने के लिए बिबिध मनुज-शरीरों में कृपानिधि भगवान ने अवतार लिया है—
जब जब होहिं धरम के हानी।बाढैं असुर अधम अभिमानी।।
करहीं अनीति जाई नहिं बरनी।सीदहिं बिप्र धेनु सुर धरनी।।
तब तब प्रभु धरि बिबिध सरीरा।हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा।।
इसी श्रृंखला में श्वेतवाराह कल्प में वैवश्वत मन्वन्तर के अट्ठाइसवें द्वापर युग में भाद्रपद कृष्ण अष्टमी की मध्यरात्रि में पृथ्वी का संकट हरने के लिए मथुरा में माता देवकी के गर्भ से भगवान कृष्ण ने अवतार लिया--एक ऐसा अवतार जिसने विश्व को अपने कर्तव्य के प्रति सचेत होने, युगानुकूल धर्माचरण में प्रवृत्त करने तथा वंश-परिवारवाद से ऊपर उठकर समष्टिहित में अन्याय और शोषण के विरुद्ध खड़े होने का गीतारुपी विगुल फूँका तथा जिसके स्मरण मात्र से दैहिक-दैविक-भौतिक त्रिविध संताप नष्ट हो जाते हैं।   
मनीषा ने साधना के लिए चार रात्रियों का विशेष माहात्म्य बताया है-  कालरात्रि (दीपावली), महारात्रि (दुर्गाष्टमी), मोहरात्रि (श्रीकृष्णजन्माष्टमी) और शिवरात्रि। जन्माष्टमी का व्रत व्रतराज कहा गया है।  जिनके जन्म के संयोग मात्र से बंदी गृह के सभी बंधन स्वत: ही खुल गए, सभी पहरेदार घोर निद्रा में चले गए, माँ यमुना जिनके चरण स्पर्श कर धन्य-धन्य हो गईं- उन भगवान श्रीकृष्ण को सम्पूर्ण सृष्टि को मोह लेने वाला अवतार माना  गया है। इसी कारण जन्माष्टमी की रात्रि को मोहरात्रि कहा गया है। इस रात में योगेश्वर श्रीकृष्ण का ध्यान करते, नाम-कीर्तन करते अथवा मंत्र जपते हुए जगने से संसार की मोह-माया से आसक्ति हटती है, प्राणियों के  सब क्लेश दूर हो जाते हैं, दुख-दरिद्रता से उद्धार होता है और इस लोक में सुख भोग कर मनुष्य जन्म-मरण के चक्र से छूटकर परमलोक को प्राप्त करता है।
इस वर्ष श्रीकृष्णाष्टमी का व्रत 28अगस्त (बुधवार) को है तथा श्रीकृष्णजन्मोत्सव का पावन समय रात्रि 11.36 पर है। सुखद संयोग है कि इस वर्ष तिथि के साथ ही भगवान का प्रिय नक्षत्र रोहिणी भी जन्मसमय पर उदित है। व्रत का पारण 29 अगस्त (बृहस्पतिवार) को सूर्योदय के पश्चात प्रथम प्रहर में अपेक्षित है।
पुराणों  के अनुसार जिस राष्ट्र या प्रदेश में यह व्रतोत्सव किया जाता है, वहां पर प्राकृतिक प्रकोप या महामारी का ताण्डव नहीं होता। मेघ पर्याप्त वर्षा करते हैं तथा फसल खूब होती है। जनता सुख-समृद्धि प्राप्त करती है। इस व्रतराज के अनुष्ठान से सभी को प्रेय और श्रेय दोनों की प्राप्ति होती है। व्रत करने वाला भगवत्कृपा का भागी बनकर इस लोक में सब सुख भोगता है और अन्त में वैकुंठ जाता है। कृष्णाष्टमी का व्रत करने वाले के सब क्लेश दूर हो जाते हैं, दुख-दरिद्रता का नाश होता है। जीवनसाथी, संतान, आरोग्य, आजीविका आदि  सहज सुलभ हो जाते हैं।
व्रत-विधि---- इस व्रत को करने वाले व्रत के एक दिन पूर्व हल्का-सात्विक भोजन करें तथा पूजन-स्थान की सफाई कर लें। उपवास वाले दिन सूर्योदय से पहले उठकर, स्नान आदि नित्यक्रिया से निवृत होकर पूजन-स्थान पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुँह करके बैठें। घी का दीपक या धूपबत्ती या दोनों जलाकर गणेश-अम्बिका, पार्वती-शंकर, इष्टदेवता, कुलदेवता, ग्रामदेवता, स्थानदेवता और लोकपालों का ध्यान कर हथेली पर जल, अक्षत, सुपारी, फूल और द्रव्य रखकर मन में अपनी कामना-पूर्ति की इच्छा के साथ उपवास सहित व्रत का संकल्प करें-
संकल्प--- मम  अखिल पाप प्रशमनपूर्वकं सर्वाभीष्ट सिद्धये श्रीकृष्णाष्टमी व्रतोपवासं अहं करिष्ये।
संकल्पित होकर संयमपूर्वक मन, वाणी और शरीर से पवित्र रहकर व्रत का पालन करें। उपवास के दिन झूठ बोलने, जुआ खेलने, सज्जनों-स्त्रियों का अपमान करने तथा अपशब्द बोलने से बचें। व्रत के दिन बार-बार जल पीने से, एक ही बार पान-तम्बाकु के उपभोग से, दिन में सोने से तथा मैथुन से व्रत भंग हो जाता है।
असकृज्जलपानाच्च सकृत्ताम्बूलचर्वणात्।
उपवासः प्रणश्येत दिवास्वापाच्च मैथुनात्।।
ध्यान रहे कि विवशता में उपवास का कोई मतलब नहीं है। यदि पूर्ण निराहार नहीं कर सकें तो फलाहार, दुग्धपान कर सकते हैं किन्तु फलाहार के नाम पर चाट-पकौड़े, पकौड़ी, आलू की टिक्की आदि का सेवन बिल्कुल ही ना करें। इन्द्रियों पर संयम ना हो तो व्रत कदापि न करें। माता देवकी सहित वासुदेव श्रीकृष्ण का ध्यान करते, नाम-कीर्तन करते अथवा मंत्र जपते हुए रात्रि जागरण करें। यदि पूरी रात नहीं जग सकें तो भगवान् के जन्मकाल के समय पूजन-आरती तक अवश्य जगें।
पूजन-विधि—
सूर्यास्त के बाद स्नानादि से निवृत होकर पूजा-स्थान पर सपरिवार बैठकर भगवान का गर्भवास स्थिर लग्न में शाम 7:40 के पहले कर लें। इसके लिये काँसे के कटोरे में दूध डालकर उसमें लड्डूगोपाल की प्रतिमा अथवा शालिग्राम रखें तथा ढक दें। अखण्ड दीप जलाकर पूजन-थाली सजा लें—
सामग्री—
कलश, काँसे की थाली, गंगाजल, अक्षत, सुपारी, पान के पत्ते, चन्दन, रोली, सिन्दूर, धूप, दीपक, कपूर, रूई की बत्ती, माचिस, मौली, एक साफ रुमाल, भगवान के कपड़े, मुकुट, मोरपंख, बाँसुरी, पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद और शक्कर), फल (ऋतुफल तथा खीरा) फूल, तुलसीदल, कुशा, आम के पत्ते तथा नजर उतारने के लिये अजवाइन और मिट्टी का कसोरा रख लें।
सविधि कलश स्थापित कर लें।
अब प्रसाद तैयार करें—
प्रसूता को दी जानेवाली हल्दी तथा अछवाइन (सूखे मेवों का पाक), भूने धनिया और शक्कर का चूर्ण, साबूदाने की खीर, सिंघाड़े का हलवा, माखन,
इसके बाद अपनी श्रद्धा से पुरुष सूक्त, श्री गजेन्द्र-मोक्ष (विपत्तिनाश के लिये), श्री विष्णु-सहस्रनाम आदि से भगवान् की स्तुति करें और सामर्थ्य भर निम्नलिखित किसी एक मन्त्र का जप-कीर्तन करें।
 ॐ नमो नारायणाय ” 
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने।
प्रणत: क्लेश नाशाय गोविन्दाय नमो नमः।।
श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारे हे नाथ नारायण वासुदेव
वसुदेवसुतंदेवं कंसचाणूरमर्दनम्।
देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगदगुरुं
संतान प्राप्ति के लिये संतानगोपाल मन्त्र का जप करें—
देवकी सुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं ब्रजे।।
जप के लिये तुलसी, स्फटिक अथवा कमलगट्टे की माला लेनी चाहिये। माला न हो तो हाथ पर ही जप करें। रुद्राक्ष की माला प्रयोग में कदापि न लाएँ।
जन्मकाल के ठीक पहले श्रीमन्महागणाधिपतये नमः, देवक्यै नमः, वसुदेवाय नमः, बलभद्राय नमः, सुभद्रायै नमः, यशोदायै नमः, नन्दायै नमः का उच्चारण करें तथा हाथ में फूल-अक्षत लेकर माता देवकी की पूजा करें—
प्रणमे देव-जननी त्वया जातस्तुवामनः
गायद्भिः किन्नराद्यैः सतत परिवृता वेणुवीणानिनादैः
भृङ्गारादर्शकुम्भप्रवरयुतकरैः सेव्यमाना मुनीन्द्रैः
पर्यङ्के राजमाना प्रमुदितवदना पुत्रिणी सम्यगास्ते
सा देवी-देवमाता जयति सुरमुखा देवकी कान्तरूपा
जन्म-समय पर श्री रामचरितमानस के राम-जन्म के छन्द काँसे की थाली और ताली की थाप तथा जयघोष के साथ पढ़ें—
भये प्रगट कृपाला, दीन दयाला, कौसल्या हितकारी.....
भगवान् को दूध से निकलकर स्नान, पंचामृत स्नान, स्वच्छ जल से पुनः स्नान करायें तथा रुमाल से पोंछकर वस्त्रादि से सज्जित करें। मिट्टी के कसोरे में कपूर जलाकर अजवायन से भगवान् की नजर उतारें। अब उनका सविधि उपचारों से पूजन करें और भोग अर्पित करें। अन्त में आरती उतारें, प्रार्थना करें और पुष्पाञ्जली दें।
व्रत के अगले दिन सूर्योदय के बाद माता के साथ बालकृष्ण की पूजा-अर्चना करें। सत्पात्रों को यथाशक्ति दान देकर पारण करें।
सम्पूर्ण श्रद्धा-भक्ति से किया गया यह व्रत सभी अभीष्ट देनेवाला हो- इसी के साथ सबको श्रीकृष्णाष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएँ।



  
  




Friday, May 31, 2013

मानसून की वृथा आशा....


31 मई 2013 को मिथुन राशि में गुरू का बुध-शुक्र से मेल दक्षिण-पश्चिम में अतिवृष्टि योग बना रहा है। राजनेता आपसी विद्वेश के कारण शिष्टाचार की सीमाएँ लांघेगे। उपयोगी वर्षा में कमी  होगी जिससे फसलों की हानि का संकट बना है।
मिथुने च गुरुर्याति तत्राब्दे दारुणं भयं।
नृपाणां विग्रहस्तत्र मेघा स्वल्प जलप्रदाः।।
जून महीने में जहाँ भयंकर गर्मी से उत्तर-पश्चिमी प्रान्त हलकान होंगे वहीं उड़ीसा, मुम्बई, केरल, आसाम, शिलॉंग, भूटान, में भारी वर्षाजनित संकट के योग हैं।
सम्वत् 2070 में नवमेघ समुच्चय का तम नामक मेघ है। समय पर वर्षा न होने और असामयिक वर्षाजन्य अनेकानेक रोगों से जनजीवन परेशान होगा। चतुर्मेघों में संवर्तक मेघ दक्षिण प्रान्तों में बाढ़ और सुनामी की भयावह स्थिति के संकेत देता है।
ऐसे ही लक्षण इस वर्ष प्रभावी विवह नामक वायु के भी हैं। दक्षिणी-पश्चिमी समुद्रतटवर्ती भूभाग समुद्री तूफानों, भूकम्पों, और भूमध्यगत वायुतरंगों की विभीषिका से आक्रान्त होगा  तथा दक्षिण प्रान्तों (उड़ीसा, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, केरल आदि) में कहीं-कहीं विनाशकारी बाढ़ जनजीवन को अस्त-व्यस्त करता दिख रहा है। वैसे भी इस वर्ष रोहिणी का समुद्र में वास वायुवेग, समुद्री तूफान तथा भूकम्पों से हानि की आशंका देता है।
सम्वत् 2070 विक्रमाब्द यानि वर्तमान पराभव संवत्सर में सूर्य के आर्द्रा-प्रवेश कालीन ग्रहीय स्थिति के अनुसार वृश्चिक राशिस्थ चन्द्रमा पर वृषस्थ मंगल की दृष्टि जल शोषक है, जो अनेक भारतीय प्रान्तों, विशेषकर उत्तर भारत में वर्षा का संकट उत्पन्न करेगी। साथ ही शनि-राहु का लग्नस्थ मंगल से षडाष्टक योग, मंगल से दूसरे भाव मिथुन राशि में बुध, गुरू और शुक्र के साथ सूर्य की उपस्थिति इस वर्ष देश के कुछ प्रान्तों में अकाल तो दक्षिण प्रान्तों (उड़ीसा, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, केरल आदि) में कहीं विनाशकारी बाढ़ तथा सागर तटवर्ती भूभाग पर समुद्रजन्य विनाश से भयंकर हानि के संकेत हैं।
उत्तर-पूर्वी तथा पूर्वी प्रान्तों में भीषण प्राकृतिक प्रकोपों (कहीं बाढ़ तो कहीं सूखे) से खड़ी फसलों के नष्ट हो जाने के कारण जनसामान्य के कष्टों में वृद्धि की आशंका है।
वह्नि-वेदाष्ट-नन्देन्द्रा एतत् संख्यासु भास्करः।
तिथिषु आर्द्राम् यदा याति कष्टदः शेषके शुभः।।
ईश्वर की कृपा और प्रजारंजक भावना से सरकारें सचेत रहें और संकट के क्षण टल जाएँ- ईश्वर से इसी प्रार्थना के साथ..... पं. शील भूषण शर्मा

Wednesday, April 17, 2013

'पराभव' की आशंकाएँ



बृहस्पतिवार, चैत्र शुक्ल प्रतिपदा 2070 विक्रमाब्द (11 अप्रैल 2013 ईस्वी) से आठवें युग तथा विष्णुविंशति के अंतिम संवत्सर का आरंभ हुआ है, जिसे शास्त्रों ने पराभव नाम से अभिहित किया है। रविवार, चैत्र कृष्ण अमावस्या 2070 विक्रमाब्द (30 मार्च 2014 ई.) तक प्रसरित पराभव की अवधि 354 दिनों की होगी। 
शास्त्रों के अनुसार पराभव में राजाओं (वर्तमान परिप्रेक्ष्य में शासक दल, केन्द्र-राज्य शासन, विभिन्न राजनैतिक दल) में शत्रुता और शक्तिपरीक्षण की स्थिति विकट होती दिखती है। उपयोगी वर्षा कम होने से फसल उत्पादन में कमी के कारण जन-असंतोष विद्रोह का रूप ले सकता है। दलहन का उत्पादन प्रचूरता में होगा किन्तु ग्रैष्मिक धान्य और औषधियों की उपज कम होने से इनके दाम आसमान चूमने लगेंगे। सरकार की जिद और कमजोरी के कारण कल्याणकारी कार्य कमजोर पड़ेंगे। मौसम की प्रतिकूलता के कारण फसलों का उत्पादन कम होगा, जनता अज्ञात रोगों के प्रकोप में पड़ सकती है।
दक्षिणी राज्यों में राजनैतिक अस्थिरता बढ़ेगी। केन्द्र और कुछ राज्यों में सत्ता परिवर्तन की संभावना है। अपराध, भ्रष्टाचार पर नियंत्रण के लिए महत्वपूर्ण निर्णय लेने में केन्द्र सरकार की हिचकिचाहट स्पष्ट दिखेगी। सरकार के अंग और मंत्रियों में तालमेल की कमी से राष्ट्रीय- अंताराष्ट्रीय मंचों पर शर्मसार कर देने वाले हालातों से दो-चार होना पड़ेगा।
पीडिताश्च प्रजाः सर्वाः क्षुधार्ताः स्युः पराभवे।
धान्यौषधानि नश्यन्ति ग्रीष्मे वर्षति माधवः।।
पराभवाब्दे राज्ञां स्यात् समरः सह शत्रुभिः।
आमयः क्षुद्र सस्यानि प्रभूतान्यल्प वृष्टयः।।
भीषण अग्निकाण्डों (अग्निकाण्ड, युद्धजन्य और आतंकी विस्फोटों तथा ज्वालामुखी उत्सर्जन), रोगों तथा उपयोगी वृष्टि में पर्याप्त कमी से प्रजा (जनसामान्य) भयभीत होगी, पीड़ित होगी।
पीडिताश्च प्रजाः सर्वा भयभीताः पराभवे ।।
पराभवे अग्निःशस्त्रामयार्तिः द्विज गो भयम् च — (बृहत्संहिता)
बृहस्पतिवार को वर्ष प्रवेश होने और शनिवार को मेष संक्रांति होने के कारण इस वर्ष राजा देवगुरू बृहस्पति और मंत्री सूर्यपुत्र शनि हैं। सूर्य की विभिन्न संक्रान्तियों के आधार पर सस्येश और नीरसेश मंगल, धान्येश सूर्य, मेघेश और फलेश शनि हैं। इस वर्ष रसेश गुरु हैं और दुर्ग, सैन्यादि के स्वामी शनि हैं।
संवत्सर प्रवेश के समय मात्र तीन ग्रह शुभ मण्डलों (सूर्य और मंगल वरुणमण्डल तथा गुरू चन्द्रमण्डल) में जबकि चन्द्रमा और शनि सहित छः ग्रह अशुभ मण्डलों (चन्द्रमा, शुक्र और शनि वायुमण्डल तथा बुध, राहु और केतु अग्निमण्डल) में स्थित हैं।
इस वर्ष अमेरिका, अफगानिस्तान, नेपाल, कोरिया, जर्मनी, ऑस्ट्रिया, पाकिस्तान, इण्डोनेशिया, चीन, सहित मध्य-एशिया के देशों में राजनैतिक उपद्रव, आर्थिक संकट तथा अज्ञात रोगों के साथ आतंकी घटनाओं में वृद्धि की आशंकाएँ हैं।
तुलायां तु यदा सौरिः क्रूरग्रह समन्वितः।
त्रिभागशेषा पृथिवी-मांस-शोणित कर्दमैः।।
संहिताओं का स्पष्ट संकेत है कि भारत के समुद्र तटवर्ती और जम्मु-कश्मीर सहित उत्तरी तथा पश्चिमी भूभाग प्राकृतिक प्रकोपों के चपेट में हैं। विनाशकारी भूकम्प, समुद्री तुफान, बादल फटना और भयंकर वृष्टि से जान-माल की हानि के दुर्योग हैं। जापान, इण्डोनेशिया, पाकिस्तान, चीन, सहित मध्य-एशिया के देशों में, जर्मनी, ऑस्ट्रिया, इंग्लैंड एवम्  मेष, सिंह, तुला और वृश्चिक प्रभाव राशि के देशों खासकर समुद्रवर्ती भूभाग भयावह तुफानों, भूकम्पों तथा भीषण वाहन-यान दुर्घटनाओं के शिकार होंगे।
भूकम्पादि महोत्पातो जायते यत्र मण्डले
तत्तत्स्वाभावजम् द्रव्यम् जन्तून देशाञ्च पीड़येत् ।।
उत्तरांचल, महाराष्ट्र, पूर्वोत्तर के राज्य, उड़ीसा, झारखण्ड और बंगाल में हिंसक घटनाओं पर नियन्त्रण पाना चुनौतीपूर्ण होगा।
15 अप्रैल 2013 से 22 जून तक फिर 17 जुलाई से सितम्बर तक जन- मन को अस्थिर कर देने वाले समाचार सुर्खियाँ बटोरेंगे। ताकतवर देशों में तनाव बढेंगे। कृषि उत्पादन, उद्योग, खनिज और धातुओं के व्यापार वैश्विक मन्दी रहेगी। तकनीक-कुशल लोगों (मिस्त्री, मैकेनिक, इंजीनियर, आर्किटेक्ट), शारीरिक श्रम करने वालों मजदूरों, ड्राइवर, पानी एवं हवाई जहाज के संचालकों की खूब माँग रहेगी। देश में व्यक्तिगत सुरक्षा गार्डों की माँग भी बढती दिख रही है, साथ ही सुरक्षा और बचाव करने वाले यंत्रों की माँग में वृद्धि के भी योग हैं। पुलिस, अर्धसैनिक बलों और सेना में बहाली पर जोर दिखेगा। मनोरंजन तथा व्यक्तिगत उपभोग में आनेवाले गैजेटों की बिक्री जोरों पर होगी।
मंगल ग्रह रसेश-निरसेश मात्र होने से वर्ष 2013 में युवा वर्ग को शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में वांछित सफलता में परेशानी हो सकती है। निराशा, असफलता और मजबूरी के कारण मानसिक तनाव अवसाद का रूप ले सकते हैं। युवा-आक्रोश जन्य अपराधों यथा लूटमार, राहजनी और अन्य गैरकानूनी गतिविधियाँ भारत ही नहीं बल्कि दुनिया के सभी विकसित और विकासशील देशों की सरकारों के लिए चिन्ता का विषय बनेंगी।
शनि और राहु के साथ बृहस्पति का षडाष्टक सम्बन्ध दुनियाभर के बैंको में आर्थिक मंदी और अन्य कारणों से मुद्रा का संकट ला सकता है। नकली ठग, तांत्रिक और ओझा सहित टोटकेबाजों की चांदी रहेगी। टोने-टोटके के भय और उपचार में अनपढ़ तो क्या, पढ़े-लिखे लोग भी सशंकित रहेंगे।
यह वर्ष भारत के लिए चुनौतिपूर्ण रहनेवाला है। देशवासियों के विवेक तथा धैर्य की जबर्दस्त परीक्षा लेने वाला है पराभव। देश और सम्पूर्ण विश्व परीक्षा में सफल हो इसी कामना के साथ...

Wednesday, April 10, 2013

संवत्सर गणना----अद्वितीय काल-विज्ञान


                  
भारतीय मनीषा ने सभी ऋतुओं के एक पूरे चक्र को संवत्सर के नाम से अभिहित किया है, अर्थात् किसी ऋतु से आरम्भ कर पुनः उसी ऋतु की आवृति तक का समय एक संवत्सर होता है----सर्वर्तुपरिवर्त्तस्तु स्मृतः संवत्सरो बुधैः(क्षीरस्वामी कृत अमरकोश)। दूसरे अर्थों में संवत्सर के अन्दर सभी ऋतुओं का निवास होता है—संवसन्ति ऋतवः अस्मिन् संवत्सरः(क्षीरस्वामी कृत अमरकोश,कालवर्ग,20)। निरुक्त ने तो सभी प्राणियों की आयु की गणना इन्हीं संवत्सरों के द्वारा होने के कारण कहा है कि जिसमें सभी प्राणियों का वास हो, समय के उस विभाग को संवत्सर कहते हैं—संवत्सरः संवसन्ते अस्मिन् भूतानि(निरुक्त,अ.4,पा.4,खं.27)। सारांशतः, जो काल- विभाग सभी ऋतुओं और प्राणियों का आधार है, उसे संवत्सर कहते हैं। स्पष्टतः ऋतुओं के आगमन-परिवर्तन, उनका प्रभाव-काल, प्राणियों की अवस्था, व्यवहार आदि में कालजन्य परिवर्तन आदि की गणना संवत्सर के ज्ञान के बिना नहीं की जा सकती है।
काल-गति के चक्रवत् होने के कारण संवत्सरारम्भ के दिन का निर्णय एक गूढ़ विषय है। ब्रह्मपुराण के अनुसार-चैत्रे मासि जगद् ब्रह्मा ससर्ज प्रथमे अहनि। शुक्लपक्षे समग्रं तु तदा सूर्योदये सति।। अर्थात् ब्रह्माजी ने चैत्रमास के शुक्लपक्ष के प्रथम दिन सूर्योदय होने पर संसार की सृष्टि की। इसी कारण वाचनिक रूप में सृष्टि के आरम्भ की यह तिथि संवत्सर के आरम्भ की तिथि के रूप में प्रचलित हुयी है।
वास्तव में संवत्सर की छः ऋतुएँ उष्णता और शीतता के आधार पर तीन-तीन के दो समूहों में बँटी दिखती हैं— वसन्त, ग्रीष्म और वर्षा उष्णता प्रधान तथा शरद्, हेमन्त और शिशिर शीत प्रधान हैं। श्रुतियों ने अग्नीषोमात्मकम् जगत् कहकर अग्नि (उष्ण) और सोम (शीत) को सृष्टि का प्रधान कारण माना है। इन दोनों में शीत जहाँ प्रकृति का स्वाभाविक रूप है वहीं उष्णता जीवन का लक्षण है। यानि प्रकृति में उष्णता का संयोग जीवोत्पत्ति का आधारभूत कारण है। मृत प्रकृति को जीवन (उष्णता) प्रदान करने के कारण ही सूर्य मार्तण्ड कहलाता है—मृतेण्ड एष एतस्मिन् यदभूत्ततो मार्तण्ड इति व्यपदेशः(श्रीमद्भागवत)। जड़वत् प्रकृति में उष्णता का आरम्भ वसन्त से होता है यानि सर्वांगशीतल प्रकृति में वसन्तागमन से प्राप्त उष्णता के द्वारा जीवन स्पन्दित हो उठता है। सम्भवतः इसी कारण वसन्त में ही ब्रहमा द्वारा सृष्टि की रचना का वर्णन आर्षग्रन्थों में वर्णित है।
वसन्त का पहला महीना होने के कारण प्रकृति चैत्र के महीने से जीर्ण-शीर्ण पत्रादिकों को त्यागकर नवीन पत्र-पुष्पों के आभरण से सजने लगती है। जीवन के आधारभूत पेड़-पौधों को सोम (औषधि-गुण) प्रदान करने वाला चन्द्रमा शुक्लपक्ष की प्रतिपदा से अभिवर्धमान होता है। एक ओर यह दिन चन्द्रमा की प्रथम कला के आरम्भ का दिन है तो दूसरी ओर राशि चक्र की प्रथम राशि मेष पर संक्रमण को उत्सुक जड़ प्रकृति में चेतना-प्रवाह का कारक सूर्य चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के समय उच्चाभिलाषी रहता है। इसी कारण भारतीय मनीषा ने चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को संवत्सरारम्भ माना है।
रात्रि का अंधकार जड़ता का प्रतीक होता है। सुषुप्ति आशा का संचार नहीं करती है। अतः नया वर्ष सूरज की पहली किरण का स्वागत करके मनाया जाता है, आधी रात में नहीं जीर्ण हो चुके पत्तों का गिरना और नयी कोंपलों का फूटना युगपत् हैं, पतझड़ और बहार समकालिक हैं। पुरान के अवसान और नवीनता के आगमन का संदेश सुनाता नव संवत्सर अपने गहरे अर्थों में जीवन का दर्शन समझाता आता है।
नव गति, नव लय, ताल-छंद नव
नवल कंठ, नव जलद-मन्द्ररव;
नव नभ के नव विहग-वृंद को
नव पर, नव स्वर दे !
आज संवत्सरारम्भ के उषःकाल में जगन्नियन्ता से इसी प्रार्थना के साथ नव संवत्सर का स्वागत है...